Raja Bhoj Story In Hindi Part-3.

राजा भोज चौहदा विद्याओं का घमंड भाग-3 । Raja Bhoj Story In Hindi Part-3

Raja Bhoj Story In Hindi Part-3

भगवान शिव और माता पार्वती के महल से जाने के बाद राजा भोज गहन चिंतन में फैंस जाते हैं कि वास्तव में पंद्रवी विद्या है बड़ी कमाल की जिसने मेरे घमंड को चकनाचूर करके रख दिया। अब राजा के आगे एक समस्या थी कि इस विद्या को सीखा कैसे जाए ? अचानक राजा को ख्याल आया भगवान शिव और माता पार्वती का जो उनके महल से काफी दूर जा चुके थे।

राजा तुरंत अपनी गद्दी से खड़े हुए और भागते – भागते महल के बाहर पहुंचे। फिर उस दिशा में अपने कदम बढ़ाते है जहां से भगवान शिव और माता पार्वती जा रहे थे। दूर से ही राजा को वे दोनों नजर आए। उनके पास जाते ही राजा भोज भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में गिर गए और बोले, “हे कृपा निधान आप मेरी समस्या का समाधान करके जाए।”

भगवान शिव – महाराज आप तो चौहदा विद्या निदान शासक हैं। दूर – दर तक आपके नाम की छवी है, फिर आपको क्या समस्या हो सकती है।

राजा भोज – हे कृपा निधान वह मेरी बहुत बड़ी भूल थी। मुझे क्षमा करें। आगे से मैं ऐसी धारणा अपने मन में कभी नहीं लाऊंगा।

भगवान शिव – तो अब बताइए, आप मुझ से क्या चाहते हो ?

राजा भोज – हे भगवान शिव मैं पंद्रवी विद्या सीखना चाहता हूं तो कृपया आप मेरा मार्गदर्शन करें।

भगवान शिव – देखो राजन यह विद्या सीखना इतना भी आसान नहीं है। यह बेहद कठिन परिस्थितियों भरा रहता है जिसे सीखने की कोई समय सीमा नहीं है, ना जाने इसे सीखने में कितना समय लगे तब तक राज्य का कामकाज कैसे चलेगा ? अच्छा यही होगा कि आप पंद्रवी विद्या सीखने का विचार अपने मन से निकाल दे।

राजा भोज – नहीं – नहीं महाराज चाहे कितना भी कठिन से कठिन कार्य हो, मैं करूंगा, चाहे कितना भी वक्त लग जाए, मैं वक्त निकालूंगा। कृपया आप मुझे रास्ता दिखाए।

भगवान शिवजी – तो ठीक है। यहां से बहुत दूर हिमालय पर्वत के पास एक बहुत ही घना और भयंकर जंगल है। उस जंगल के बीच में एक सिद्ध पुरुष बाबा अमरा गुरु की कुटिया है। उस कुटिया को आप को ढूंढना होगा। इस बात का ध्यान रखना जंगल में घोड़ा नहीं जा सकता। आपको घोड़ा जंगल के बाहर ही छोड़ना होगा और आगे का रास्ता पैदल तय करना होगा। वहां अमरा गुरु तपस्या करते हुए मिलेंगे।

आप उनके चरणों में जाकर गिर जाना और पंद्रवी विद्या सिखाने का अनुरोध करना और हां एक बात का ध्यान रखना बाबा अपने स्वभाव से काफी कठोर है अगर बाबा तपस्या में लीन हो तो उनकी तपस्या भंग मत करना नहीं तो वह आपको साराप भी दे सकते हैं। इसलिए वहां बैठकर बाबा की तपस्या पूरी होने का इंतजार करना। अगर बाबा को दया आ गई तो वह आपको पंद्रवी विद्या जरूर सिखाएंगे और इतनी बात कहकर भगवान शिव और माता पार्वती अंतर्ध्यान हो गए।

भगवान शिव और माता पार्वती के अंतर्ध्यान होने के बाद राजा भोज अपने नगरी में वापस आए और अपने वफादार मंत्रियों की एक बैठक बुलाई और उन्हें आगे की योजना समझाते हुए बोले, देखो मैं एक जरूरी कार्य से राज्य से दूर जा रहा हूं। मेरे जाने के बाद आप सभी मिल जुलकर राज्य कार्य को देखोगे और प्रजा को कोई कष्ट ना हो इसका विशेष ध्यान रखना, क्योंकि मुझे वापस आने में मालूम नहीं कितना समय लग जाए। इसलिए आप सब अपना – अपना काम इमानदारी से करना।

सभी मंत्रियों को समझाकर राजा महल की ओर चल दिए। तो दोस्तों राजा भोज की दो रानियां थी। एक का नाम था सत्यवती और दूसरी का नाम था भानुवती नाम के अनुसार ही दोनों का आचरण था, सत्यवती एक पतिव्रता रानी थी। वह महाराज के दर्शन करे बैगर खाना तो क्या पानी तक नहीं पीती थी दूसरी ओर रानी भानुवति थी। उसका इन बातों से दूर – दूर तक कोई लेना – देना नहीं था। कहने का मतलब रानी भानुवति का चरित्र ठीक नहीं था।

राजा भोज पहले रानी सत्यवती के कक्ष में गए और बोले, रानी मैं किसी जरूरी कार्य से कुछ समय के लिए नगरी छोड़कर जा रहा हूं। मालूम नहीं मुझे आने में कितना वक्त लगे। यह वक्त एक वर्ष का भी हो सकता है और 12 वर्ष का भी या फिर उससे ज्यादा का भी हो सकता है इसलिए मैं आपको सलाह देता हूं, मेरे वापिस आने तक आप सावधानी से रहना।

इतनी बात सुनकर रानी सत्यवती कि आंखे झलक आई और बोली – हे राजन, मैं तो आप के दर्शन किए बगैर पानी तक नहीं पीती। भला इतना लंबा समय मैं आपके बिना कैसे बिता पाउंगी ? जिसमें आपके आने की कोई समय सीमा भी निश्चित नहीं, कृपा आप मुझे भी अपने साथ ले कर चलिए।

राजा भोज – नहीं रानी, मैं आप को साथ लेकर नहीं जा सकता क्योंकि मैं जिस कार्य से जा रहा हूं, वहां पर स्त्रियों का जाना वर्जित है तो कृपया आप मेरे काम में बाधा ना डालें।

सत्यवती – महाराज आप तो जानते ही है की आपके दर्शन किए बैगर मैं भोजन तो क्या पानी तक नही पीती चाहे मेरे प्राण ही क्यों ना निकल जाए।

राजा भोज – ठीक है, इस समस्या का समाधान मेरे पास है। मैं अपनी एक तस्वीर इस दीवार पर बना देता हूं। आप इसको भोग लगाकर भोजन कर लेना और राजा भोज ने अपनी हूबहू तस्वीर दीवार पर बना दी।

सुबह हुई और राजा भोज चलने की तैयारी करने लगे। जाने से पहले राजा ने सत्यवती को अपने पास बुलाया और समझाते हुए कहा, देखो रानी, मैं जिस कार्य के लिए आपसे दूर जा रहा हूं, वह काफी उलझन भरा रास्ता है, न जाने मेरे साथ क्या घटना घट जाए और मुझे आप से मिलने के लिए भी अपना परिचय देना पड़े। इसलिए मैं आपको अपनी मूंछ का बाल देकर जा रहा हूं। इसको संभाल कर रखना

क्योंकि मैं जब भी वापस आऊंगा, आपसे सबसे पहले अपनी मूंछ का बाल मांगूंगा तो आप समझ जाना कि मैं ही राजा भोज हूं और यह बात गुप्त रखना। किसी को बताना मत रानी ने मूंछ का बाल लिया और एक डिबिया में कैद कर उसे गुप्त जगह संभाल कर रख दिया।

दोस्तों केवल एक मुंछ के बाल ने रानी के मन में अनेक सवाल खड़े कर दिए थे । आखिर क्या समस्या आने वाली थी जो राजा ने यह कदम उठाया ? आखिर क्यों उन्होंने अपनी यात्रा को एक कठिन चुनौती और उलझन भरा रास्ता बताया ? क्या राजा भोज वापिस लौटेंगे या लौटेगा उनके भेष में कोई ओर। इस कहानी का भाग 4 जल्द ही प्रकाशित किया जायेगा जिसमे कई रहस्य खुलकर आपके सामने आएंगे। जानने के लिए बने रहे हमारे ब्लॉग वर्तमान सोच के साथ। कमेंट करके जरूर बताये यह भाग आपको कैसा लगा ?

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राजा भोज चौहदा विद्याओं का घमंड भाग-2

राजा भोज चौहदा विद्याओं का घमंड भाग-4

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