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गुरु की तीन कढ़वी बाते शिष्य के लिए बनी वरदान। Best Guru Shishya Story In Hindi

Guru Shishya Story In Hindi

एक ज्ञानी साधू का एक शिष्य था, जो स्वभाव में बहुत ही बोला और नासमझ व्यक्ति था। शिष्य अपने गुरु का आदर सम्मान बड़ी ही निष्ठा और तहे दिल से करता था, किंतु फिर भी वह अपने गुरु की कुछ बातों को नजरअंदाज कर देता। साधु उसे संसार की मोह-माया और पारिवारिक रिश्तो से दूर रहकर एक साधुत्व का जीवन जीने की सलाह देते थे। जो शिष्य को कतई मंजूर नहीं था। वह परिवार से दूर नहीं रह सकता था और अपने गुरु की भक्ति भी नहीं छोड़ना चाहता था। वह गुरू भक्ति और पारिवारिक रिश्तों में कोई भेद नहीं रखना चाहता था।

एक दिन वह अचानक अपने गुरु के पास आश्रम में आया और बोला “गुरुजी मेरा रिश्ता पक्का हो गया है।” गुरुजी यह बात सुनते ही शौक में डूब गए और अपने उदास मन से बोले “बेटा तेरा रिश्ता हो गया अब तू मेरे वार(तरफ) से गया।” शिष्य अपने स्वभाव से थोड़ा भोला और नासमझ था, वह अपने गुरु की बात का अर्थ नहीं समझ पाया किंतु इतना समझ चुका था कि गुरु जी मेरे रिश्ते से खुश नहीं है और वह वहां से चला जाता है।

कुछ दिनों बाद वह दुबारा अपने गुरु के पास आता है और कहता है, “मैं आपको अपनी शादी का कार्ड देने आया हूं।” गुरुजी ने फिर वैसा ही जवाब दिया और बोले “बेटा अब तू तेरे परिवार से भी गया।” उसनें अपने गुरु जी के इस कथन का भी कोई जवाब नहीं दिया। कुछ दिन बाद में वह फिर अपने गुरु जी के पास आया और बोला गुरुजी मेरा विवाह हो गया और पत्नी भी घर आ गई है।

गुरुजी ने तीसरी बार भी एक वैसा ही कथन बोल डाला “बेटा अब तो तु दुनिया से गया।” अपने गुरू के मुख से ऐसी तीन बातें सुनकर वह थोड़ी नाराजगी से बोला गुरु जी आप नहीं जानते मेरे परिवार वाले मुझसे बहुत प्रेम करते हैं। हमेशा उन्हें मेरी फिक्र रहती है। और मुझे पत्नी भी मुझसे प्रेम करने वाली मिली है। तो आप ही बताइए मैं इन बंधनों को छोड़कर चला जाऊं।

Guru Shishya Story In Hindi.

उसकी बात सुनकर गुरु जी बोले, “तो क्या सच में तुझे ऐसा लगता है कि तेरे परिवार वाले और तेरी नई पत्नी तुझे इतना प्रेम करते हैं ?” वह बोला “जी बिल्कुल इसमें कोई शक नहीं।” गुरुजी – तो ठीक है मैं तेरे परिवार वालों की एक परीक्षा लेना चाहता हूं। जिससे सिध्द हो जाएगा की वे तुझसे कितना प्रेम करते हैं ? इसके लिए तुझे मेरा एक काम करना होगा।

गुरु बना शिष्य

शिष्य- जी अवश्य ! बोलिए क्या काम है ? फिर गुरु जी ने अपने शिष्य के साथ मिलकर एक योजना बनाई। जिससे सिध्द हो जाएगा सत्य क्या है ?

गुरु जी:- एक काम कर आज तु घर जा और अचानक पेट दर्द का बहाना करके जमीन पर गिर जा और जो-जोर से चिल्लाने लग जा। ताकि तेरी आवाज सुनकर वहां सभी एकत्रित हो जाएं। फिर तेरे घरवालें डाॅक्टर को बुलाएंगे। उसकी दवाई लेने के बाद भी तुझे कहना है मेरे पेट में दर्द बढ़ता ही जा रहा है। मेरे गुरु जी को बुला दो मुझे वही ठीक कर सकते हैं नहीं तो मैं मर जाऊंगा और जैसे ही मैं वहां पहुंचता हूं, तु मरने का बहाना कर देना।

अपने गुरु की पूरी योजना सुनने के बाद शिष्य ने कहा ठीक है गुरु जी आज देखते हैं किसके वचन सत्य हैं।

वह अपने घर पहुंचता है और अपने गुरु जी के कहे अनुसार पेट दर्द का बहाना कर जमीन पर गिर जाता है। उसके घर वाले उसे इस अवस्था में देखकर भयभीत हो गए। उन्होंने जल्दी से डॉक्टर को बुलाया सभी काफी दुखी दिखाई दे रहे थे। जिसे देखकर शिष्य थोड़ा मन ही मन खुश हुआ लेकिन उसे अभी योजना आगे बढ़ानी थी वह बोला मुझे दवाइयों से कोई फायदा नहीं हो रहा कृपया आप जल्दी मेरे गुरु जी को बुला लाओ केवल वही मुझे ठीक कर सकते हैं। नहीं तो मैं आज मर जाऊंगा।

उसके बड़े भाई तुरंत भाकर गुरु जी को बुला लाए। जैसे ही गुरु जी ने घर के अंदर कदम रखा उनके कहे अनुसार शिष्य बहाना कर दम तोड़ देता है। गुरू जी उसका हाथ देखते है और अपना भगवा रंग के तौलिये से उसे ढक देते हैं और अपने निराश मन से कहते हैं, “आप लोगों ने मुझे बुलाने में थोड़ी देर कर दी मेरा शिष्य अब नहीं रहा।” मरने की बात सुनते ही उसके घरवाले खूब जोर-जोर से रोने लगे। कोई अपना माथा जमीन पर मारता है, तो कोई भगवान से उल्टा-सीधा बोलता है। पूरा परिवार शौक के सागर में डूब चुका था।

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घरवालों को ऐसे रोते देख गुरुजी बोले “रुको रोइए मत मैं इसे जिंदा कर सकता हूं।” गुरुजी की यह बात सुनते ही सभी ने अपने आंसू थाम लिए। और कहने लगे तो गुरुजी इंतजार किसका करिए ना जिंदा। गुरुजी बोले, “जिंदा तो मैं कर दूंगा लेकिन ये बताओ इसकी जगह जाएगा कौन ?” किसी एक को इसकी जाना होगा और यह जिंदा हो जाएगा।

सभी घरवाले गहन चिंतन में फैंस गए। सभी ने एकदम चुप्पी साध ली। उनकी चुप्पी को तोड़ने के लिए गुरु जी बोले, “माता जी आप सबसे ज्यादा रो रही हैं। आप क्यों नहीं चली जाती इसकी जगह।” माता बोली, “नहीं गुरु जी मैं चली गई तो मेरे पति को रोटी कौन पकड़ाएगा।” गुरु जी शिष्य के पिता से बोलते हैं, पिता बोलते हैं “गुरु जी मेरे बाद मेरी पत्नी का है ही कौन?” गुरुजी उसकी पत्नी से बोले जो अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी।

पत्नी बोली, “गुरुजी मेरी अभी नई-नई शादी हुई है, अभी तो मुश्किल से 15 दिन भी नहीं हुए भला मैं क्यों अपनी जान दूं मेरी तो दूसरी शादी भी हो जाएगी।”

सबकी बात सुनकर गुरू जी बोले, “तो ठीक है इसकी जगह मैं चला जाता हूं।” सभी घरवाले खुश हो गए। घरवाले- यह ठीक है गुरु जी आपके तो आगे-पीछे कोई है भी नहीं। गुरुजी बोले, “तो ठीक है मेरा कुछ सामान लाओ 1 किलो दूध, 3 बाजरे की रोटी, एक पांव देसी घी।” घर वालों ने सभी सामग्री लाकर गुरु जी को दे दी उन्होंने दूध में रोटियां मोरी(मिलाई) और उसमें घी डालकर बोले अब मैं यह पिऊगां और मेरे पीते ही मेरी आत्मा इसके अंदर चली जाएगी।

(घी- दुध तो गुरुजी का एक बहाना मात्र था भोजन करने के लिए) जैसे ही गुरु जी ने इसे पीकर खत्म किया। शिष्य का हाथ पकड़ कर बोले खड़ा हो जा। शिष्य जो पहले से ही जिंदा था मरने का तो केवल एक बहाना था, खड़ा होकर बैठ गया। उसके घरवालें उसे जिंदा होते देख काफी खुश हुए, लेकिन अपने परिवार की नकली खुशी देखकर वह एक गहरे दुख में डूब गया।

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गुरुजी ने उसके उदास चेहरे को देखा और बोले तो ठीक है अब मैं चलता हूं यहां दम तोड़ दूंगा तो तुम्हें परेशानी होगी मैं खुद ही चला जाता हूं श्मशान घाट। गुरुजी जैसे ही जाने के लिए आगे बढ़े शिष्य ने उनके पैर पकड़ लिए और बोला, “कहा जा रहे हो गुरुजी ?” अपने इस भोले और नासमझ भक्त को अपने साथ लेकर नहीं जाओगे ? तब से शिष्य ने सांसारिक मोह-माया और पारिवारिक रिश्तो से अपने सारे बंधन तोड़ लिए और अपने गुरु जी के साथ दूर रहने का निश्चय कर लिया। और उन्हीं की कृपा से उसने अंतरध्यान के लिए नाम शब्द हासिल किया।

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गुरू और शिष्य की कहानी आपको कैसी लगी कृपा कॉमेंट के माध्यम से जरूर बताए ।

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