Guru Bna Shishya Hindi Story.

गुरु बना शिष्य। हिंदी कहानी। Best Hindi Inspirational Story। Guru Bna Shishya Hindi Story

Guru Bna Shishya Hindi Story
गुरु बना शिष्य

एक बार एक महान गुरु जुन्नैद एक गांव से गुजर रहा था। वह बड़ा पंडित था, बड़ा जानकार था। और जानकारों की बड़ी मुसीबत है कि वे जानते हैं, तो दूसरे को बताना चाहते है कि कोई मिल जाए जिसको सिखा दे। ऐसा हुआ उस दिन कोई न मिला। वह धार्मिक गांव रहा होंगा । कई को पकड़ने की कोशिश की गुरु जी ने लेकिन लोगों ने कहां कि अभी जरा दूसरे काम से जा रहे हैं जब फुरसत होंगी तब आयेंगे।

जो लोग जानते रहे होंगे इस पंडित को कोई न मिला तो एक छोटा बच्चा मिल गया। वह एक दिया लिये जा रहा था एक मजारपर चढ़ाने को, तो जुन्नैद ने उसको कहां, “यह दिया तूने ही जलाया ?” उस लड़के ने कहां, निश्चित मैंने ही जलाया ” ‘तो तु क्या यह बता सकता है कि ज्योति जब तूने जलाई थी तो कहां थी ? और जब तूने जलाई तो कहां से आयी ? किस दिशा से ?”

Guru Bna Shishya Hindi Story.

उस लड़के ने कहां कि देखो । फूंक मारकर उसने दिया बूझा दिया और कहां कि ‘अब ज्योति कहां गई, आप ही बता दो, आप के सामने ही गई – तब मैं बता दूंगा कहां से आई। जुन्नैद को पहली दफा होश आया कि बड़ी-बड़ी ज्ञान की मैं बातें करता हूं कि यह संसार कहां से आया, किसने बनाया, और यह ज्योति सामने ही मेरी आंखों के लीन हो गई और मैं नहीं बता सकता कि कहां गई ! उसने झुककर उस बच्चे के पैर छुए।

और जुन्नैद ने लिखा है कि उसी दिन मैंने पंडित होने का त्याग कर लिया । ज्ञान कचरा है । क्या बकवास मैंने भी लगा रखी है ? छोटी-छोटी बात का पता नहीं, बड़ी-बड़ी बात कर रहा हूं ! अपना पता नहीं, संसार की बात कर रहा हूं । खुद की कोई खबर नहीं, खुदा की चर्चा चला रहा हूं ! जुन्नैद उसी दिन परिवर्तित हो गया।

जुन्नैद ने कहां, अब हम सिखाने नहीं निकलते, अब सीखने निकलते हैं। वह शिष्य हो गया । वह बड़ा विनम्र आदमी हो गया । उसकी विनम्रता अनूठी थी । उसने हर किसी से सीखा । और जब वह ध्यान को उपलब्ध हुआ तो उससे लागों ने पूछा, तो उसने इस बच्चे को अपना पहला गुर बताया । दूसरा गुरू एक चोर को बताया । लोगों ने कहा, चोर और गुरु !

उसने कहां, हां, एक गांव में मैं देर से पहुंचा । सारा गांव तो सोया था । धर्मशाला तो बंद हो चुकी थी, एक चोर एक अन्धेरी गली में मुझे मिल गया । उसने कहां कि देखो, अब इस रात के अंधेरे में तुम्हें कहीं कोई जगह न मिलेगी, विश्राम न मिलेगा । मेरे घर तुम आ सकते हो, लेकिन मैं तुम्हें बता दूं, क्योंकि तुम फकीर हो, मैं चोर हूं – अपना धंधा बिलकुल अलग-अलग, और फकीर से झूठ क्या कहना !

सच-सच बता देता हूं नहीं तो कहीं पीछे तुम पछताओगे कि कहां चोर के घर में रुक गये। मुझे को ऐतराज नहीं है, और मुझे कोई डर नहीं है कि तुम मुझे बदल लोगे, मैं पक्का चोर हुं तुम्हें अगर डर हो कि मैं तुम्हें बदल लूंगा, तुम कहीं और ठहर जाओ ।

जुन्नैद ने कहां है कि मैंने सोचा, मन में मेरे भय तो आया था, चोर पहचान गया । मन में एक बात तो आयी थी कि चोर के घर रकना ? ठीक नहीं है, क्योंकि सत्संग सोचकर करना चाहिए ।। लेकिन जब चोर ने कहां कि ‘मै पक्का चोर हूं, तुम मुझे न बदल पाओगे । इसलिए मुझे उसकी कोई चिता नहीं है । हां तुम्हें अगर डर है कि मेरे पास रहकर मेरा रंग तुम्हें लग जायेगा । तुम अगर कच्चे फकीर हो तो कहीं भी ठहर जाओ । तुम्हारी मर्जी ।’ चोट लग गई क्योंकि उसने कहां, ‘कच्चे फकीर ।

जुन्नैद रुक गया और फिर महीने भर रुका रहा, चोर अनोखा आदमी था । रोज सांझ चोरी के लिए निकलता, रोज बड़ी आशा से भरा हुआ निकलता और जुन्नैद से बड़ी बातें करता कि आज महल में ही प्रवेश करनेवाला हूं, तो देखना कि तिजोरी ही उठा लाऊंगा । और रात जब लौटता तब भी उदास न दिखाई पड़ता । दरवाजा जब जुन्नैद खोलता और पूछता कि लाये ? तो वह कहता आज तो नहीं लगा दांव, लेकिन कल पक्का है । ऐसे महीना बीत गया । दांव लगा ही नहीं । मगर उस आदमी की आंख की चमक न गयी । उसकी आशा न खोयी । उसने कभी भी निराशा प्रगट न की । वह हताश न हुआ।

फिर जुन्नैद उसे छोड़कर चंला गया बाद में जुन्नैद जब परमात्मता की खोज में डूबा और रोज दिन बीतने लगे और परमात्मा की कोई झलक न मिली तो एक दिन उसने तय कर लिया कि बस अब बहुत हो गया, अगर आज मिलता है परमात्मा तो ठीक, अगर न मिलता तो समझ लेंगे, है ही नहीं । तभी उसे चोर की याद आयी।

उसने कहां कि कच्चे फकीर ! और मैं पक्का चोर ।’ और वह चोर साधारण संपत्ति खोज रहा है, लेकिन निराश नहीं है । और मैं परम संपत्ति को खोजने निकला हूं और इतनी जल्दी हताश हो गया ! फिर जाग गया, और फिर उस चोर ने मेरा साथ दिया, उसकी स्मृति ने मेरा साथ दिया । और जब तक मैंने परमात्मा न पा लिया तब तक में चोर के सहारें ही चला । इसलिए दूसरा मेरा गुरु वह चोर है ।’ ऐसे उसने नौ गुरु गिनाये । उसने सबसे सीखा ।

बुद्ध ने अंतिम क्षणों में कहा है, ‘आप दीपो भव । अपने दीये हो जाओ । कब तक शास्त्रों के दिए लिये फिरोगे । वे तो बुझे दीये हैं । शब्दों के दिये कब तक काम आयेंगे ।

गुरु बना शिष्य कहानी आपको कैसी लगी कृपा कॉमेंट के माध्यम से जरूर बताए ।

इन stories को भी ज़रूर पढ़ें

चतुर चमार की कहानी

पिता की चार सीख

लकड़हारे से राजा भोज बनने की कहानी

Related Posts

संत की परीक्षा

चार ब्रह्मण पंचतंत्र की कहानी

दिमाग को हिला देंगी ये 5 शिक्षाप्रद कहानियां

गुरु जी की महानता

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *